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सिनेमा की पेंटिंग हैं मधुबाला, दिलीप साहब ने यूं ही नहीं किया होगा भरी अदालत में प्यार का इजहार

मधुबाला के जाने से सिनेप्रेमियों की 'ब्लैक एंड व्हाइट' से 'कलर' हुई जिंदगी मानों फिर से 'ब्लैक एंड व्हाइट' सी हो गई।

By: Gaurav Nauriyal  |  Published: February 23, 2018 2:02 PM IST

सिनेमा की पेंटिंग हैं मधुबाला, दिलीप साहब ने यूं ही नहीं किया होगा भरी अदालत में प्यार का इजहार

मेरे दौर की पीढ़ी ने मधुबाला को स्क्रीन पर तब नहीं देखा जिस दौर में सिनेमाहॉल में बैठे हुए दर्शक मधुबाला को शायद अपलक निहार रहे हों! मधुबाला के इतराने पर शायद वो मुस्कुरा जातें हों या फिर पर्दे पर उन्हें किसी सीन में टूटते हुए देखकर उनका दिल भी भर आता हो, लेकिन मधुबाला के गुजरने के 48 सालों बाद भी सिनेमा की इस अदाकारा की रूमानियत को महसूस किया जा सकता है। अब जबकि मधुबाला की खूबसूरती और अदाकारी के किस्से भर रह गए, ऐसे में 'वीनस ऑफ इंडियन सिनेमा' और 'द ब्यूटी ऑफ ट्रैजेडी' जैसे नामों से पहचाने जाने वाली मधुबाला की जिंदगी को पलटकर देखना किसी ख्वाब सा ही लगता है। ऐसा ख्वाब जिसमें दीवानगी की इंतहा थी और खूबसूरती की बेपनाह नजाकत। बुलंदी का ऐसा ख्वाब जो शायद हर एक्ट्रेस देखती हो। अफसोस आज ही के दिन 1969 में भारतीय सिनेमा की ये उम्दा एक्ट्रेस लंबी बीमारी और गहरे अवसाद को समेटे इस दुनिया से रुखसत हो गई।

14 फरवरी, 1933 को दिल्ली में जन्मी मधुबाला की जिंदगी कई मायनों में खास है। मधुबाला अताउल्लाह खान की 6 बेटियों में तीसरे नंबर की संतान थी और तब उन्हें मुमताज के नाम से पहचाना जाता था। 8 साल की उम्र में अताउल्लाह खान गरीबी की हालत में दिल्ली से मुंबई पंहुच गए और यहीं से शुरू हुआ मुमताज के मधुबाला बनने का सफर। 1942 में 8 साल की उम्र में पहली दफा बॉम्बे टॉकीज में मधुबाला का आॅडिशन लिया गया था। बॉम्बे टॉकीज वही प्रोडक्शन हाउस था, जिसने दिलीप कुमार और अशोक कुमार जैसे अभिनेताओं को ब्रेक दिया। ये वो दौर था जब आर्टिस्ट को खुद ही गाना भी होता था। मधुबाला का आॅडिशन हुआ और पहली फिल्म 'बसंत' के जरिए बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट उन्होनें अपना डेब्यू किया।

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मुमताज से ऐसी बनीं 'मधुबाला'
'बसंत' में बच्ची मुमताज का अभिनय देख उस समय की जानी-मानी अभिनेत्री देविका रानी बहुत प्रभावित हुई। उन्होंने मुमताज को अपना नाम बदलकर 'मधुबाला' रखने की सलाह दी, जिसे तुरंत मान भी लिया गया। वर्ष 1947 में 'नील कमल' में मुमताज के नाम से मधुबाला ने आखिरी फिल्म की थी और इसके बाद वह मधुबाला के नाम से ही पहचानी जाने लगी। पहचान भी ऐसी जो भारतीय सिनेमा में 'अमिट' जैसी है।

फिर आए आलोचक
वर्ष 1950 के दशक के बाद मधुबाला की एक के बाद एक कई फिल्में बॉक्स आॅफिस पर फ्लॉप होने लगी। ये वही दौर था जब आलोचक वापस लौट आए। यहां तक कहा गया कि मधुबाला ने 'प्रतिभा' नहीं, बल्कि अपनी सुंदरता के चलते पॉपुलैरिटी पाई है। ये कुछ हद तक सच भी था, लेकिन अधूरा। मधुबाला ने न केवल कई शानदार फिल्में की थी, बल्कि सुदंरता के मामले में भी वो अपने दौर की अभिनेत्रियों के मुकाबले कई आगे खड़ी थीं। उनकी सुंदरता की दीवानगी का ही आलम था, जो उस दौर में दिलीप साहब और किशोर कुमार जैसी शख्सियत मधुबाला पर अपना दिल लुटा बैठे थे।

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फिर ऐसे दिया आलोचकों को जवाब
कई फिल्में फ्लॉप होने के बाद 1958 में मधुबाला ने एक बार फिर अपनी प्रतिभा को साबित किया। इसी साल उन्होंने भारतीय सिनेमा को 'फागुन', 'हावड़ा ब्रिज', 'काला पानी' और 'चलती का नाम गाड़ी' जैसी सुपरहिट फिल्में दीं। ये वो फिल्में थी जिन्होंने आलोचकों का मुंह बंद कर दिया था। एक तरह से देखें तो ये मधुबाला का जवाब था अपनी प्रतिभा पर उठने वाली उंगलियों को लेकर।

वो क्लासिक फिल्म जिसके लिए शरीर पर मधुबाला ने डाली बेडियां
मधुबाला के बिना 'मुगल-ए-आजम' का जिक्र मुमकिन नहीं। उन दिनों के. आसिफ की इस क्लासिक फिल्म की शूटिंग चल रही थी। मधुबाला की तबीयत काफी खराब रहा करती थी और वह घर में उबले पानी के सिवाय कुछ नहीं पीती थीं, लेकिन उन्हें फिल्म के लिए जैसमेलर के रेगिस्तान में कुएं और पोखरे का गंदा पानी तक पीना पड़ा। एक सीन के लिए मधुबाला के शरीर पर असली लोहे की जंजीर भी लादी गई, लेकिन उन्होंने 'उफ' तक नहीं की और फिल्म की शूटिंग जारी रखी। मधुबाला मानती की कि 'अनारकली' के किरदार को निभाने का मौका बार-बार नहीं मिलता। वर्ष 1960 में जब 'मुगल-ए-आजम' प्रदर्शित हुई तो फिल्म में मधुबाला के अभिनय से दर्शक मुग्ध हो गए थे, लेकिन इधर मधुबाला बीमार पड़ने लगी थी।

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दिलीप साहब ने भरी अदालत में कहा मधु से करता हूं प्यार
मधुबाला और दिलीप कुमार की प्रेम कहानी 1951 में आई फिल्म तराना के सेट से शुरू हुई थी। दोनों की नजरें मिलीं और पहली नजर का प्यार हो गया। मधुबाला ने अपने इश्क के इजहार के लिए दिलीप कुमार के मेकअप रूम में एक पर्ची और गुलाब भेजा था। इस पर्ची पर लिखा था, ‘अगर आपको मुझसे मोहब्बत का इकरार हो तो इस गुलाब को कुबूल फरमाएं’। दिलीप ने चेहरे पर मुस्कान लाते हुए मधुबाला के इश्क को रजामंदी दे दी। दोनों का इश्क मधुबाला के पिता अताउल्ला खान को रास नहीं आया। मामला इस कदर बढ़ गया कि दिलीप साहब के साथ मधुबाला के बजाय वैजयंतीमाला को साइन कर लिया गया और गुस्साए अताउल्लाह खान ने मामले को अदालत में घसीट लिया। बाद में जब सुनवाई के दौरान दिलीप कुमार की गवाही हुई तो उन्होंने कोर्ट में कहा- 'हां, मैं मधु से प्यार करता हूं और करता रहूंगा'। हालांकि इसके बाद दोनों ने 'मुगल-ए-आजम' की शूटिंग की और फिर कभी एक-दूसरे से बात तक नहीं की।

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...और मधुबाला पड़ गई बीमार
1960 का ये वो दौर था जब किशोर और मधुबाला ने शादी कर ली थी। बाकायदा किशोर कुमार ने मधुबाला से शादी करने के लिए मुस्लिम धर्म तक अपनाया और अपना नाम करीम अब्दुल रख लिया। शादी के बाद मधुबाला बीमार रहने लगी। मधुबाला के इलाज के लिए किशोर तब लंदन चले गए और यहां उन्हें पता चला कि मधुबाला के दिल में छेद है। डॉक्टरों ने साफ कह दिया था की मधुबाला ज्यादा दिनों तक जी नहीं सकेंगी। इस बीमारी से कुछ दिनों तक तो मधुबाला लड़ती रही, लेकिन फिर तकलीफ बढ़ने से उन्होंने अभिनय से विदा लेने का मन बना लिया।

निर्देशन में उतरी 'बीमार' मधुबाला

मधुबाला ने एक्टिंग तो छोड़ दी थी, लेकिन सिनेमा उनसे दूर नहीं हुआ था। बीमारी की हालत में ही मधुबाला ने एक्टिंग के बजाय निर्देशन का फैसला लिया। वर्ष 1969 में उन्होंने फिल्म 'फर्ज' और 'इश्क' का निर्देशन करना चाहा, लेकिन यह फिल्म नहीं बनी और इसी वर्ष अपना 36वां जन्मदिन मनाने के महज 9 दिनों के बाद यानी कि 23 फरवरी 1969 को मधुबाला ने आखिरी सांस ली।

मधुबाला के जाने से केवल किशोर कुमार ही नहीं, बल्कि कई लोग टूट चुके थे। सिनेप्रेमियों को ऐसा लगा जैसे उन्होंने अपनी किसी खूबसूरत चीज को खो दिया है। लोगों के बीच में कई तरह के किस्से तैरने लगे थे। मधुबाला के साथ 'ब्लैक एंड व्हाइट' से 'कलर' हुई जिंदगी मानों फिर से 'ब्लैक एंड व्हाइट' सी हो गई। बस वही किस्से और रूमानियत अब हैं जो मधुबाला को महज एक खूबसूरत एक्ट्रेस के बजाय सिनेमा की एक नायाब पेंटिंग बना देती हैं। पर्दे पर अपनी मुस्कान बिखेरकर समां को रंगीन बना देने वाली मधुबाला के लिए एक इंटरव्यू में मशहूर पेंटर एम.एफ हुसैन ने कहा था- 'मुझे मधुबाला की मुस्कान बेहद पसंद हैं।' भारतीय सिनेमा की ये अदाकारा यूं ही नहीं हर दौर में याद की जाती रहेंगी।


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Gaurav Nauriyal