बायोपिक इन दिनों मानों बॉलीवुड फिल्ममेकर्स के लिए सबसे सेफ जोन बन गया है। 2002 में भगत सिंह पर एक साथ 5 बायोपिक आई थी। इसके बाद 2005 में मंगल सिंह की बायोपिक देखने को मिली और फिर तो मानों ये सिलसिला चल ही निकला। गाहे-बगाहे रियल लाइफ से प्रेरित होगा सिल्वर स्क्रीन पर किरदार नजर आते रहे, लेकिन बायोपिक बनाने का चलन पिछले कुछ सालों में ही ज्यादा तेज हुआ है। फ्रीडम फाइटर्स से निकला ये दौर धीरे-धीरे अंडरवर्ल्ड डॉन से होता हुआ स्पोर्ट्स और फिल्मी हस्तियों तक पहुंच गया है। इस साल भी बायोपिक की फेहरिस्त पिछले कुछ सालों के मुकाबले देखें तो तेज ही रही। हालांकि, बॉलीवुड अपने ही अंदाज में बायोपिक बनाता रहा, जिनमें गानों और बाकी एंटरटेनिंग मसालों की कभी कमी नहीं रही। [Soorma Movie Review : हॉकी के असली 'सूरमा' की कहानी को पर्दे पर दिल से जी गए दिलजीत दोसांझ]
मैरी कॉम, सचिन तेंदुलकर और एम एस धोनी के बाद इस शुक्रवार को हॉकी लेजेंड संदीप सिंह की बायोपिक 'सूरमा' रिलीज हुई है, लेकिन इन सभी फिल्मों में केवल 'सचिन : ए बिलियन ड्रीम्स' ही बायोपिक के करीब लगती है। इस लिस्ट में शामिल बाकी फिल्मों को बायोपिक के बजाय उन शख्सियत से प्रेरित कहानी कहना ही ज्यादा बेहतर रहेगा। 'सूरमा' भी इसी लिस्ट में शामिल है, जिसमें संदीप सिंह की कहानी भी है तो बॉलीवुड फिल्म के लिए जरूरी मसाले भी...जो इसे बायोपिक से थोड़ा दूर कर देते हैं। 'सूरमा' अच्छी फिल्म है, जिसकी जान दिलजीत दोसांझ हैं तो अंगद बेदी और विजय राज भी, लेकिन बावजूद इसके ये बायोपिक का अहसास कम और एक बॉलीवुडिया मसाला फिल्म का ही अहसास ज्यादा करवाती है।
शेखर कपूर की 'बैंडिड क्वीन' याद आती है
'सूरमा' में ऐसे कई लूपहोल्स हैं। स्क्रिप्ट और डायरेक्टर दोनों कई जगह गच्चा खा जाते हैं। एक प्लेयर की कहानी चल रही होती है और अचानक एक गाना आपको मूल कहानी से उठाकर फैंटेसी के धरातल पर ला पटकता है। एक प्लेयर जो पैरलाइज होकर भी उठ खड़ा होता है, उसे अपने सबसे महत्वपूर्ण मैच में सबसे शानदार गोल करने के लिए हीरोइन का चेहरा देखना जरूरी होता है...ऐसे सीन फिल्म को विशुद्ध मनोरंजक तो बना देते हैं, लेकिन बायोपिक के नाम पर अपना असर खो देते हैं। बायोपिक की जब भी बात होती है तब शेखर कपूर की 'बैंडिड क्वीन' याद आती है, जिसे देखते हुए लगता है कि फूलन की अपनी कहानी चल रही है.. जिसमें शेखर ने चालाकी से कैमरे फिट करवा दिए हैं।
पीछे भी पलटकर देखें तो पेंटर रवि वर्मा की बायोपिक 'रंगरसिया', सरबजीत की इसी नाम से बनी बायोपिक, गैंगस्टर अरुण गवली की बायोपिक 'डैडी', मिल्खा सिंह की बायोपिक 'भाग मिल्खा भाग', मैरी कॉम की इसी नाम से बनी बायोपिक, फोगाट सिस्टर्स पर बेस्ड 'दंगल', दशरथ मांझी की बायोपिक 'मांझी' और नीरजा भनोट की बायोपिक 'नीरजा' जैसी कई दिलचस्प कहानियां पर्दे पर आई हैं, लेकिन इनमें बॉलीवुड ने हमेशा ही अपने मसाले ही ज्यादा फिट किए। ऐसा नहीं है कि बतौर फिल्म इनमें से कोई भी एक-दूसरे कमतर थी, लेकिन बतौर बायोपिक इनमें 'सरबजीत' और 'मांझी' ही अपना प्रभाव छोड़ती हैं।
इस मामले में चूक जाता है बॉलीवुड
पिछले हफ्ते रिलीज हुई 'संजू' को लेकर भी यही बहस जारी थी। संजय दत्त की जिंदगी के सबसे बदरंग दिनों से दर्शक वाकिफ हैं, लेकिन फिल्म देखते हुए आप इन बदरंग किस्सों में भी रंग पाएंगे, जिनमें नायक दोषमुक्त है! यहीं पर बॉलीवुड बायोपिक के नाम पर अपनी 'अति' थोपकर 'ईमानदारी' को पीछे छोड़ देता है और यह महज एक फिल्म भर रह जाती है। बायोपिक का सीधा सा फंडा और परिभाषा ही है कि सच-झूठ को 'एज इट इज' परोसना, जैसे आॅटोबायोग्राफी के साथ होता है। उसमें सहूलियत की गुंजाइश से ज्यादा सच की गुंजाइश होती है, लेकिन बॉलीवुड इस मामले में चूक जाता है। ऐसा शायद फिल्म पर लगे पैसे और बायोपिक के आम दर्शकों के लिए बोझिल हो जाने के चलते भी किया जाता हो, लेकिन ऐसे में इन फिल्मों को बायोपिक कहना भी एक तरह से देखें तो 'थोपा' जाना ही ज्यादा है।
आगे भी आने वाली हैं बायोपिक
खैर, आगे भी 'मंटो' से लेकर राजनेता बाल ठाकरे पर बायोपिक आने वाली है। इसके अलावा आगे एस्ट्रोनॉट राकेश शर्मा से लेकर कारगिल के हीरो कैप्टन विक्रम बत्रा पर भी बायोपिक आनी है। चर्चा तो ओशो की बायोपिक की भी है, लेकिन इन सबके बीच एक ही सवाल कौंधता है कि क्या बायोपिक का स्तर आगे बढ़ सकेगा, जैसा कि पश्चिम के सिनेमा में देखने को मिलता है। बॉलीवुड गानों और मसालों से इतर शायद किसी रोज एक ऐसी बायोपिक को सामने लाकर रख दे जिसे देखकर वाकई में प्यार हो जाए। कई दफा तो ऐसा लगता है कि सारे संसाधन, सारे एफर्ट महज बॉक्स आॅफिस के खेल में आगे बढ़ने के लिए ही खर्च कर दिए गए, बजाय कि उस शख्सियत का एक दस्तावेज तैयार कर देने के जो सिनेमा में अपनी अमिट छाप छोड़ दे। एक ऐसी बायोपिक जो बेंचमार्क सेट कर अपनी अमिट छाप छोड़ दे, जैसे रिचर्ड एटनबर्ग की 'गांधी' छोड़ जाती है या फिर माइकल मेन की 'अली'।
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