Soorma Quick Movie Review: पहले भाग तक आपको बांध कर रखेगी दिलजीत दोसांझ की ये फिल्म

शाद अली द्वारा निर्देशित इस फिल्म ने आज दी है सिनेमाघरों में दस्तख

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By: Gaurav Nauriyal | Published: July 13, 2018 11:17 AM IST

बॉलीवुड में इन दिनों बायोपिक का दौर सा चल पड़ा है। दो हफ्ते पहले ही राजकुमार हिरानी बॉलीवुड अभिनेता संजय दत्त की जिंदगी के कुछ हिस्सों को लेकर 'संजू' लेकर हाज़िर हुए थे और अब शाद अली भारतीय हॉकी प्लेयर संदीप सिंह की बायोपिक सूरमा लेकर मैदान मारने के लिए उतरे हैं। बायोपिक के अपने खतरे भी होते हैं, लेकिन ऐसा लग रहा है कि ये सुरक्षित जोन भी है। चर्चित किरदार और सिनेमा मिलकर तिलिस्म न भी रचें लेकिन बॉक्स ऑफिस की नैया पार लगवा देंगे, कम से कम फिल्मकार यह तो शायद मानने लगे हैं।

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'सूरमा' एक ऐसे खिलाड़ी की बायोपिक भी है , जिसकी कहानी प्रेरणा देने वाली है। हॉकी के मैदान में बेहतरीन ड्रैग फ्लिकर माने जाने वाले संदीप सिंह का किरदार फ़िल्म में दिलजीत दोसांझ ने निभाया है। साथ में हैं तापसी पन्नू, अंगद बेदी, कुलभूषण खरबंदा और विजय राज जैसे दमदार किरदार। शाद अली की पिछली फिल्मों के मुकाबले 'सूरमा' अच्छी फिल्म है, लेकिन स्पोर्ट्स बायोपिक के नाम पर इसे आप औसत दर्जे में ही शामिल कीजिए।

कैसा है फिल्म का फर्स्ट हाफ

फिल्म का फर्स्ट हाफ अच्छा है। फिल्म सधी हुई रफ्तार से कम समय में काफी कुछ समेटते हुए इंटरवल तक पहुंचती है। संदीप सिंह (दिलजीत दोसांझ) की हॉकी को लेकर कोई दीवानगी नहीं हैं, लिहाजा वह बचपन में ही हॉकी के मैदान को छोड़ देता है। वक़्त गुजर चुका है, लेकिन संदीप की दीवानगी हॉकी को लेकर नहीं , बल्कि उसकी दीवानगी हॉकी प्लेयर हरप्रीत (तापसी पन्नू) को लेकर है। संदीप अपनी इसी दीवानगी के चलते वापस हॉकी खेलने तक के लिए तैयार हो जाता है। मैदान पर वापसी आसान नहीं है, लेकिन इस काम में संदीप की मदद करता है, उसका ही बड़ा भाई बिक्रम (अंगद बेदी)। बिक्रम खुद हॉकी प्लेयर है, बेहतरीन खिलाड़ी होने के बावजूद वह नेशनल टीम में अपनी जगह नहीं बना सका।

एक रोज बिक्रम खेत में संदीप को हॉकी स्टिक से चिड़िया भगाते हुए देखता है और गौर करता है कि संदीप के बॉल को ड्रैग करने का तरीका खास है। बिक्रम को ये तो समझ आ गया कि संदीप अच्छा ड्रैग फ्लिप कर लेता है, लेकिन अभी भी टीम में एंट्री मुश्किल है। बिक्रम, संदीप को लेकर पटियाला में हॉकी कोच हैरी (विजय राज) के पास पहुंचता है और यहीं से एक एमेच्योर ड्रैग फ्लिकर के प्रोफेशनल प्लेयर बनने की कहानी शुरू होती है। संदीप, हरप्रीत के लिए हॉकी खेलना चाहता है , जिसके साथ-साथ उसके पिता और भाई का सपना भी समानांतर चल रहा है।

संदीप इंडियन टीम की ओर से खेलते हुए 2006 में अपने पहले ही इंटरनेशनल डेब्यू मैच में तहलका मचा देता है। जिंदगी जिस वक्त पटरी पर लौटती हुई लग रही होती है, ठीक उसी दौरान वर्ल्ड कप खेलने के लिए जाते हुए ट्रेन में संदीप सिंह को एक सुरक्षाकर्मी के हाथों गोली लग जाती है। कुल मिलाकर कहें तो फिल्म का फर्स्ट हाफ मनोरंजक है।