Shekhar Kapur Exclusive: पूरी दुनिया में अपनी पहचान बना चुके फिल्ममेकर शेखर कपूर (Shekhar Kapur) अपनी फिल्मों के जरिए न केवल कहानियां सुनाते हैं, बल्कि दर्शकों को एक अलग एक्सपीरियंस का हिस्सा बना देते हैं. हाल ही में 'बॉलीवुडलाइफ' (Bollywoodlife) के साथ खास बातचीत में उन्होंने 'मासूम' से लेकर 'बैंडिट क्वीन' तक के अपने सफर, सेंसर बोर्ड के साथ लंबी लड़ाई और फिल्म मेकिंग के बदलते दौर पर खुलकर चर्चा की.
'बैंडिट क्वीन' के लिए सुप्रीम कोर्ट तक की लड़ाई
जब शेखर कपूर से पूछा गया कि उनके दौर और आज की फिल्म मेकिंग में क्या फर्क है, तो उन्होंने बताया कि चैलेंडेस हमेशा से रहे हैं. उन्होंने याद किया कि जब उन्होंने 'बैंडिट क्वीन' बनाई, तो उसे बैन कर दिया गया था. शेखर ने बताया, 'हम सेंसर बोर्ड से लड़े, हाई कोर्ट गए और फिर सुप्रीम कोर्ट में एक साल तक जंग चली. कुल दो साल की लड़ाई के बाद फिल्म रिलीज हो पाई.' उनका मानना है, कि यदि आप अपने काम के प्रति पैशनेट हैं, तो आपको उसके हक के लिए लड़ना चाहिए.
डॉक्यूमेंट्री और फिल्म में फर्क, एक 'आर्ट' का एक्सपीरियंस
शेखर कपूर के अनुसार, डॉक्यूमेंट्री बाहर से जानकारी इकट्ठा करके दिखाई जाती है, लेकिन फिल्म एक 'आर्ट' (कला) है. उन्होंने कहा, 'कला वह है, जो आपके दिल में एक अनुभव डाल दे. फिल्म की कहानी आपसे ऐसे जुड़नी चाहिए कि आप उसे महसूस कर सकें.' उन्होंने यह भी कहा कि अगर वह आज दोबारा 'बैंडिट क्वीन' बनाएं, तो वह बिल्कुल अलग होगी. कहानी नहीं बदलेगी, लेकिन समय के साथ उनके अनुभव और फील बदल गए हैं, जो फिल्म में साफ नजर आएंगे.
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फिल्म के लिए ऐसे होती है कड़ी मेहनत
फिल्म मेकिंग के समय होने वाले जादुई पलों को शेयर करते हुए, शेखर कपूर ने एक मजेदार किस्सा शेयर किया, उन्होंने कहा- 'बैंडिट क्वीन' के लास्ट सीन में ट्रेन का गुडरना बेहद जरूरी था, हालांकि वो पहले से तय नहीं था, उस वक्त मुझे लगा कि ऐसा ज्यादा सही होगा, उन्होंने कहा, 'मुझे नहीं जानकारी थी, कि ट्रेन किस समय आएगी, तो मैं पटरी पर कान लगाकर उसकी आवाज सुनने की कोशिश करने लगा. मेरी Intuition कह रही थी, कि शॉट के बीच में ट्रेन का गुजरना, काफी अच्छा रहेगा. उन्होंने कहा, 'मैंने सीमा और मनोज बाजपेयी को एक्शन बोला और ठीक उसी समय ट्रेन वहां से गुजरी. वह एक ऐसा पल था, जो पहले से तय नहीं था, लेकिन कैमरे में कैद हो गया.
'मोगैम्बो' और 'हवा-हवाई' जैसे किरदार एक्टर की देन हैं'
शेखर कपूर की फिल्मों के किरदार चाहे वह 'मिस्टर इंडिया' का मोगैम्बो हो या हवा-हवाई आज भी अमर हैं. हालांकि, इसका श्रेय वह खुद नहीं लेते. उन्होंने पोलाइटली कहा, 'किरदार एक्टर बनाते हैं. मैं श्रीदेवी जैसा डांस नहीं कर सकता और न ही मेरे पास अमरीश पुरी जैसी आवाज है. अगर मैं उन्हें एक्टिंग करके दिखाऊं, तो शायद मैं दुनिया की सबसे बुरी फिल्म बनाऊंगा.'
ये होता है डायरेक्टर का रियरल वर्क
शेखर कपूर ने शेयर किया, कि 'एक डायरेक्टर का रियल वर्क एक्टर को अच्छी तरह समझना है. और अर एक बार आपने एक्टर को अपनी बात समझा दी, और आप ये समझ गए कि एक्ट कैसा है, तो उनके साथ तालमेल बेहतरीन बैठता है, जिससे एक शानदार काम निकलकर सामने आता है.
फिल्म कला है, जो जुनून से बनती
आखिरी में शेखर कपूर ने बताया कि फिल्म सिर्फ रील पर नहीं बनती, बल्कि उसे बनाने वाले को भी फिल्म बदलने की ताकत रखती है. उन्होंने कहा, कि जो इंसान 'बैंडिट क्वीन' बनाने निकला था, वह फिल्म पूरी होने के बाद पूरी तरह बदल जाता है, क्योंकि फिल्म एक आर्ट है और उस फिल्म के बनने के एक्सपीरियंस ने उसे पूरी तरह बदल दिया होता है, फिल्म काफी कुछ सिखाती है.
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