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पान खाने का शौक न होता तो प्राण न बनते विलेन, अमिताभ की कहानी भी होती अलग

पुलिस इंस्पेक्टर बने अमिताभ को पुलिस थाने में कुर्सी पर बैठे प्राण को लात मारनी थी डायलॉग था- 'ये पुलिस स्टेशन है तुम्हारे बाप का घर नहीं।' इस सीन में अमिताभ ने प्राण की कुर्सी को लात मारने से ही इनकार कर दिया।

By: Gaurav Nauriyal  |  Published: February 12, 2018 2:58 PM IST

पान खाने का शौक न होता तो प्राण न बनते विलेन, अमिताभ की कहानी भी होती अलग

बॉलीवुड ने प्राण से पहले और न बाद में प्राण सरीखा कोई स्टायलिश विलेन देखा जिसकी फीस हीरो से ज्यादा होती थी। ये किस्सा तो फिल्मों के दीवाने जानते हैं कि प्राण साहब ने अपनी कुछ फिल्मों में हीरो से भी ज्यादा फीस अपने किरदार के बदले वसूली, लेकिन प्राण जैसी शख्सियत के कई किस्से और भी ज्यादा दिलचस्प हैं। प्राण साहब पान खाने के शौकीन थे और कमोबेश इसी स्वाद के जरिए उनका फिल्मों में भी सफर शुरू हुआ।

प्राण कृष्ण सिकंद यानी कि हिंदी सिनेमा का खलनायक प्राण। जो दिखता तो हीरो की तरह था, लेकिन किरदार में यूं डूब जाता कि दर्शक कई रोज तक किरदार से खौफ खाते रहते। प्राण विलेन बने तो खौफ का पर्याय बन गए, दोस्त बने तो दिल जीत लिया और पिता बने तो आंखें नम कर गए। प्राण की शख्सियत ​गीली मिट्टी की तरह थी, जिसे जैसा चाहो ​वैसे किरदार में ढाल लो।

प्राण की एंट्री का मतलब- 'ये बंदा जरूर गड़बड़ करेगा'
फिल्म में प्राण की एंट्री का मतलब था- 'ये बंदा जरूर गड़बड़ करेगा'। दर्शक सोचते 'इसे शुरू में ही हीरो ने क्यों नहीं मार दिया!' और यही उनकी अदाकारी का पैमाना भी है। 12 फरवरी 1920 को दिल्ली के बल्लीमारन इलाके में प्राण का जन्म लाला केवल कृष्ण सिंकद के घर पर हुआ था। पिता सरकारी ठेकेदार थे तो प्राण की शान-ओ-शौकत में भी कोई कमी नहीं थी। उनका बचपन और जवानी का कुछ हिस्सा उत्तर भारत के शहरों में बीता और फिर वो पहुंच गए सिनेमा के शहर लाहौर। ये वो दौर था जब भारतीय हिंदी फिल्म इंडस्ट्री मुंबई नहीं बल्कि लाहौर में हुआ करती थी। प्राण शुरुआत में फोटोग्राफर बनना चाहते थे, लेकिन डेस्टिनी को कुछ और ही मंजूर था।

पान खाने का शौक और वली मोहम्मद का टकराना
प्राण पान खाने के बेहद शौकीन थे। पिता के चलते उनके पास कभी भी पैसों की दिक्कत नहीं थी, लिहाजा प्राण की जिंदगी भी ग्रैंड साइज ही थी। प्राण अपने निजी तांगे से लाहौर में अपनी पसंदीदा पान की दुकान पर अक्सर पान खाने पहुंचते। उस रोज भी वो सज-धजकर सुबह पान खाने पहुंचे और यहीं फिल्म राइटर वली मोहम्मद की उन पर नजर पड़ी।

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वली प्राण की शख्सियत देख इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने प्राण के पास जाकर उनसे फिल्मों में काम करने के बारे में पूछा। प्राण ने ना-नुकुर कर वली से मिलने का वादा कर लिया। तब प्राण ने खुद भी नहीं सोचा था कि वो एक दिन हिंदी फिल्मों के सबसे आयकॉनिक विलेन के रूप में पहचाने जाएंगे। वली ने प्राण को प्रोड्यूसर दलसुख पंचोली के आॅफिस का पता थमाया और प्राण से आने का वादा लेकर निकल गए। बाद में जब वली ने प्राण को दलसुख से मिलवाया तो उन्होंने प्राण को अपनी फिल्म 'यमला जट' में विलेन का रोल दे दिया। यहीं से प्राण का फिल्मी सफर शुरू हुआ। पान न होता तो प्राण का ये सफर न जाने कैसा होता।

हीरो बनकर फिर विलेन ही बने रह गए प्राण
'यमला जट' के बाद 1942 में पंचोली ने ही प्राण को नूरजहां के अपोजिट फिल्म 'खानदान' में रोमांटिक हीरो का रोल दिया, लेकिन फिल्म खास असर नहीं दिखा सकी। इसके बाद भी बतौर हीरो प्राण ने कुछ फिल्में की, लेकिन दर्शकों ने उन्हें नकार दिया। इसी दौरान भारत—पाकिस्तान का विभाजन हो गया और प्राण को लाहौर छोड़ना पड़ा। प्राण मुंबई पहुंच गए। उनके स्ट्रगल का दौर फिर से शुरू हो गया और फिर 1948 में उन्हें देव आनंद और कामिनी कौशल अभिनीत 'जिद्दी' में विलेन का रोल अदा करने का मौका मिला। फिल्म बॉक्स आॅफिस पर जबरदस्त हिट रही और प्राण की गाड़ी चल निकली। न केवल प्राण बल्कि इसी फिल्म से देव आनंद और किशोर कुमार की गाड़ी भी निकल पड़ी थी।

50 से 70 का दशक आते—आते प्राण हो गए थे प्राण साहब
50 के दशक तक खुद को फिल्मों में बतौर विलेन स्थापित कर चुके प्राण ने 60 के दशक में कॉमेड़ी और पॉजिटिव किरदारों में भी हाथ आजमाया। 70 का दशक आते-आते प्राण की लोकप्रियता इतनी ज्यादा हो गई थी कि उन्होंने कुछ फिल्मों में हीरो से ज्यादा मेहनताना भी लिया।

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अमिताभ का ये है प्राण से कनेक्शन
पान और प्राण का कनेक्शन तो आपने जान लिया, लेकिन अब इसी कनेक्शन से बॉलीवुड को मिले महानायक की कहानी से आपको रूबरू करवाते हैं। दरअसल अमिताभ बच्चन, प्राण के बेटे के दोस्त थे। अमिताभ तब तक स्ट्रगल ही कर रहे थे। फिर एक दिन प्राण ने ही अमिताभ को प्रकाश मेहरा से मिलवाया। प्रकाश 'जंजीर' के लिए एक नए चेहरे की तलाश में थे और अमिताभ उन्हें भा गए। इसी फिल्म ने अमिताभ को 'एंग्री यंगमैन' बनाकर रातों-रात बड़े स्टार्स की लिस्ट में शुमार कर दिया था।

प्राण को देखकर लात मारने से किया था इनकार

इसी फिल्म में एक आयकॉनिक सीन है, जिसमें पुलिस इंस्पेक्टर बने अमिताभ को पुलिस थाने में कुर्सी पर बैठे प्राण को लात मारनी थी डायलॉग था- 'जब तक बैठने को न कहा जाए खड़े रहो...ये पुलिस स्टेशन है, तुम्हारे बाप का घर नहीं।' इस सीन में अमिताभ ने प्राण की कुर्सी को लात मारने से ही इनकार कर दिया। वो प्राण साहब की बेहद इज्जत करते थे और इस सीन को करने में उन्हें परेशानी हो रही थी। बाद में प्राण ने ही उन्हें समझााया कि अमिताभ, उन्हें सचमुच लात नहीं मार रहे हैं, बल्कि ये सिर्फ एक एक्ट है। 'जंजीर' का ये सीन फिल्म की पहचान बन गया।

प्राण को गुजरे हुए 6 साल होने वाले हैं, लेकिन सिनेमा शायद ही कभी अपने इस पहले बैड ब्वॉय को भुला सका हो। लंबी बीमारी के बाद 12 जुलाई 2013 को 78 साल की उम्र में प्राण हमेशा के लिए दुनिया से चले गए, लेकिन पीछे छोड़ गए कई यादगार किरदार और सिनेमा के लिए अमर डायलॉग।

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