अजय देवगन और शौरभ शुक्ला की दमदार अदाकारी से सजी 'रेड' आखिरकार इस शुक्रवार को सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। एक ईमानदार अधिकारी और एक बाहुबली राजनेता के इर्द-गिर्द घूमती फिल्म की कहानी में सिस्टम की झलक भी मिलती है और उम्मीद भी कि कुछ 'जिद्दी' अफसर हर दौर में रहे हैं, जिनकी रीढ़ पॉलिटिकल प्रेशर और निजी हमलों के बावजूद नहीं झुकी। गंभीर किरदारों को स्क्रीन पर खींच ले जाने में माहिर अजय देवगन की 'रेड' एक दिलचस्प फिल्म है। इंटेस रोल में अजय एक गैप के बाद पर्दे पर नजर आएं हैं और उनके डायलॉग्स पर कई दफा सीटियां भी सुनाई देती हैं। 'रेड' अच्छी कहानी का इंतजार कर रहे दर्शकों के लिए है।
ये है कहानी:
'रेड' की कहानी 80 के दशक की एक सुबह से शुरू होती है। अमय पटनायक (अजय देवगन) एक ईमानदार असिस्टेंट इनकम टैक्स कमिश्नर है। अपनी इसी ईमानदारी के चलते अमय का 49वीं दफा लखनऊ में तबादला होता है। उसके तबादले से लखनऊ की सत्ता के गलियारों में भी हलचल है। इसी दौरान अमय को एक फोन आता है और मुखबिर रामेश्वर सिंह (सौरभ शुक्ला) की बेहिसाब संपत्ति के बारे में जानकारी देता है। रामेश्वर सिंह सत्ताधारी पार्टी का सांसद है और इलाके में अपने दबदबे के लिए पहचाना जाता है। रामेश्वर सिंह की दबंगई इस कदर है कि उसे ताऊजी के संबोधन से पुकारा जाता है। खैर, ये ऐंठ भी अमय के सामने टूटती है, लेकिन बाद में। इधर, अमय की पत्नी नीता (इलियाना डीक्रूज) भीतर से चिंतित है, लेकिन साथ ही ये हौसला भी है कि अमय अपनी धुन का पक्का है और वह यह काम भी अच्छे से निपटा लेगा। सुबह का वक्त रेड डालने के लिए मुकर्रर किया जाता है।
गाड़ियों का काफिला रामेश्वर सिंह के घर रेड डालने के लिए निकल पड़ता है, लेकिन अभी तक डिपार्टमेंट के लोगों को भी नहीं मालूम की रेड आखिर कहां पड़ने जा रही है। रामेश्वर सिंह के घर के बाहर पहुंचते ही अधिकारियों के होश फाख्ता हो जाते हैं। उनके सामने इलाके के सबसे दंबग आदमी का घर है और साथ में एक जिद्दी अफसर। ना-नुकुर के बाद आखिर टीम रामेश्वर के घर पहुंचती है और सर्च अभियान शुरू हो जाता है। काफी खोजबीन के बाद भी टीम के हाथ कुछ नहीं लग पाता। किचन, मंदिर, गौशाला, बेडरूम सब जगह तलाशी हो गई, लेकिन हाथ खाली हैं। अब दिक्कत यह है कि खाली हाथ लौटे तो सांसद बख्शेगा नहीं और कुछ नहीं मिलेगा, ये मानने को अमय राजी होता नजर नहीं आ रहा।
इंटरवल से ऐन पहले अमय के हाथ पहला खजाना लगता है और इसके बाद ब्लैकमनी, गोल्ड, प्रॉपर्टी के पेपर धीरे-धीरे निकलने शुरू होते हैं। रामेश्वर सिंह जो अब तक ताव में है, अब बैकफुट पर आना शुरू करता है। इस बीच तनातनी में एक समय ऐसा आता है जब अमय, रामेश्वर को घर से बाहर जाने की अनुमति देकर रेड रुकवाने का चैलेंज दे देता है। मामला सीएम से होकर पीएम के दरबार तक पहुंच गया। इंदिरा गांधी के कार्यकाल की हल्की सी झलक फिल्म में देखने को मिलती है। जब कहीं से भी रामेश्वर सिंह को रेड रुकवाने में मदद नहीं मिल पाती तो वह अपनी गुंड़ों की फौज का सहारा लेता है। टीम को घर में ही चारों ओर से घेर लिया जाता है। 4 दिन से रेड डाले हुए बैठे अफसरों के हाथ-पांव फूल जाते हैं। भीड़ के आगे पुलिस बेबस है। घर से रेड में बरामद सामान ले जाना तो दूर अधिकारियों का निकलना भी मुश्किल है। अमय बेबस है और रामेश्वर परेशान कि भेद किसने दिया? अमय घिर गया है? नीता पर हमला हो चुका है और टीम को बचाना प्राथमिकता.. आगे क्या हुआ ये सस्पेंस तो आपका फिल्म देखकर ही खत्म होगा।
कैसा है अभिनय
इस रिव्यू की शुरुआत ही मैंने इस बात से की है कि 'रेड' अजय देवगन और शौरभ शुक्ला की दमदार अदाकारी से सजी हुई फिल्म है। ये दोनों ही इस फिल्म के सेंट्रल कैरेक्टर हैं। जब-जब दोनों साथ में स्क्रीन पर नजर आते हैं, दर्शक रोमांचित होते हैं। सौरभ का ढीठ किरदार और अजय का गंभीर अवतार जब-जब फिल्म में टकराते हैं, फिल्म एक लेवल अपने आप ऊपर चली जाती है। दोनों ने कमाल की जुगलबंदी दिखाई है, लेकिन फिल्म का सरप्राइज पैकेज है लल्लन यानी कि अमित सियाल। अमित जब-जब यूपी के किसी किरदार में दिखे हैं तब-तब उन्होंने कमाल की परफॉरमेंस दी है। वो किरदार में ढल से जाते हैं। उनकी बॉडी लैंग्वेज और संवाद अदायगी कमाल है। ठीक वैसे ही जैसे वेब सीरीज 'इनसाइड ऐज' में थी। इलियाना खूबसूरत दिखी हैं, लेकिन उनके हिस्से करने के लिए बहुत कुछ स्क्रिप्ट में ही नहीं था। गायत्री अय्यर की ये डेब्यू फिल्म थी, लेकिन उनके हिस्से भी बहुत कम संवाद आए हैं। उन्हें इस किरदार से आंकना मुश्किल है। 'रेड' से ही 85 वर्षीय पुष्पा जोशी ने भी डेब्यू किया है और उनके हिस्से गायत्री से ज्यादा गुदगुदाने वाले संवाद आए हैं। फिल्म में सहायक किरदार भी अपने-अपने रोल में परफेक्ट हैं, सिवाय फायनेंस मिनिस्टर के।
निर्देशन
'नो वन किल्ड जेसिका' और 'आमिर' का निर्देशन कर चुके राजकुमार गुप्ता कहानी कहना अच्छे से जानते हैं, उतना ही अच्छे से जितना अच्छा वह लिखते हैं, लेकिन कई जगह वो भटक भी जाते हैं। मुद्दे पर फोकस होने के बावजूद भी रेड के कई किरदार ठीक से स्क्रिप्ट में ही सांस नहीं ले पाते और नतीजतन फिल्म में वो अधूरापन सा लगता है। इंटरवल से पहले दो शानदार गानें 'सानु एक पल चैन' और 'नित खैर मंगा' भी जबरन ठुंसे हुए लगते हैं। दूसरा अस्सी के दशक की कहानी में ये अनफिट भी लगते हैं। राजकुमार गुप्ता ने कुछ लूपहोल्स को छोड़ दें तो फिल्म का निर्देशन ठीक ही किया है। ये जरा और ठीक हो जाता गर वो 21 रुपए देने वाले सीन में 2001 में जारी हुआ 20 का नोट नहीं देते! खैर राजकुमार गुप्ता अच्छी कहानी लेकर आए हैं, जो मनोरंजन करती है। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर बहुत ज्यादा लाउड नहीं है, जो कहानी को तसल्ली से आगे बढ़ने में मदद करता है। एडिटिंग कई जगह किरदार खा गई, कई जगह कट लगाना बोधादित्य बनर्जी भूल भी गए।
क्यों देखें
'पैडमैन' के बाद ये इस साल की दूसरी मनोरंजक फिल्म है। यदि आपको 'सोनू के टीटू की स्वीटी' भी पसंद आई थी तो तब आप अपनी संख्या में इसे तीन कर लीजिए। अजय देवगन, सौरभ शुक्ला और इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की कहानी देखने के लिए चले जाइए। बस पैसा छिपाने का आयडिया सीखकर न आइयेगा।