(फिल्मों में अगर कोई एक्टर हीरो के ऊपर हावी होता दिखता है तो हम उसे उसके किरदार के जरिए जानते हैं। क्योंकि फिल्म देखने से पहले तक हीरो ही हमारे लिए आकर्षण का केंद्र होता है। लेकिन कई फिल्में ऐसी भी है जिनके 'सीक्रेट सुपरस्टार' का पता हमें फिल्म रिलीज होने के बाद ही पता चलता है। ऐसे ही एक 'सीक्रेट सुपरस्टार' की हम बात करने जा रहे हैं जिनकी फोटो देख या उनके किरदारों को देख आपको उन्हें झट से पहचान जाएंगे। हालांकि ये संभव है कि आप शायद उन्हें उनके नाम से न पहचान पाएं।)
इस बार हमारे ऐसे 'सीक्रेट सुपरस्टार' है सौरभ शुक्ला। उनकी पहचान खासतौर पर उनके किरदार हैं जो उन्होंने आमिर खान से लेकर अक्षय कुमार और अजय देवगन तक की फिल्मों में निभाए हैं।
'बैंडिट क्वीन' से हुई फिल्मों में एंट्री
अपने हर किरदार से दर्शकों पर अपना अमिट छाप छोड़ देने वाले सौरभ शुक्ला ने फिल्मों में अपनी दमदार एंट्री शेखर कपूर की फिल्म 'बैंडिट क्वीन' से की। अगर आपने ये फिल्म देखी हो तो आप समझ पाएंगे कि कैसे पूरी फिल्म सीमा सिंह के ईर्द-गिर्द घूमने के बावजूद उसके दोस्त जो गांव के रिश्ते से उसका मामा भी है, ये किरदार आपके जहन में अपनी छाप छोड़ जाता है क्योंकि एक वहीं ऐसा शख्स होता है जो हर हाल में बैंडिट क्वीन का साथ देता है और मरने के करीब पहुंची चुकी बैंडिट क्वीन को पानी की बूंद पिला कर जिंदा रखने की कोशिश करता है। इस किरदार को निभा कर सौरभ शुक्ला ने अपनी बेहतरीन अदाकारी की छाप पहली फिल्म में ही छोड़ दी थी।
'सत्या' के कल्लू मामा से मिली पहचान
ये सौरभ शुक्ला की पहली फिल्म थी, इसके बाद आई उनकी फिल्म 'सत्या' में निभाए उनके कल्लू मामा वाले किरदार ने उन्हें दर्शकों की नजरों में ला दिया। तब लोग उन्हें सही में कल्लू मामा ही कहकर पुकारने लगे थे। इस किरदार ने उन्हें इंडस्ट्री में नाम तो दिला दिया लेकिन काम नहीं मिला। अच्छा काम मिलने में उन्हें 10 साल लग गए। फिल्म इंडस्ट्री, जहां हर कोई हीरो बनने की चाहत लेकर आता है, वहां सौरभ शुक्ला अच्छे किरदार करने की चाह लिए आए थे। बचपन से ही फिल्मों में काम करना चाहते थे। सौरभ शुक्ला के पिता दिल्ली यूनिवर्सिटी में म्यूजिक एंड फाइन आर्ट्स के डीन थे और मां भी इसी विभाग में कार्यरत थी।
बचपन में ही देख ली थी खूब फिल्में
सौरभ शुक्ला के पिता प्रोफेसर शत्रुघ्न शुक्ला गायक थे और आगरा घराने से ताल्लुक रखते थे। जबकि माता जोगमाया शुक्ला, हिंदुस्तान की पहली महिला तबला वादक रहीं। साल 2006 में उन्हें प्रथमा का अवॉर्ड भी मिला था। इसीलिए उनका बचपन आम बच्चों के बचपन जैसा नहीं बल्कि कुछ हटके था। माता-पिता के आर्ट्स फील्ड में होने के चलते सौरभ शुक्ला ने जमकर फिल्में देखी और इसके लिए परिवार में मनाही नहीं थी।
लड़कियों पर क्रश बना थियेटर से जुड़ने की वजह
ये भी एक सच है कि सौरभ शुक्ला की थियेटर में एंट्री सुंदर लड़कियों के चलते हुई। दरअसल उन्होंने देखा कि थियेटर में अच्छी, सुंदर और पढ़ी लिखी लड़कियां सिर्फ हैंडसम लड़कों के साथ नहीं बल्कि उन लड़कों की भी दोस्त बनती हैं तो इंटलेक्च्युअल हैं यानि बौद्धिक संपदा के धनी है। ऐसे में सौरभ को लगा की थियेटर एक बढ़िया जगह है। और उन्होंने सही मायने में पढ़ाई भी थियेटर से जुड़ने के बाद ही की।
'रेड', 'जॉलीएलएलबी', 'पीके' जैसी फिल्मों से बढ़ा कद
अपने 30 साल से अधिक के फिल्मी करियर के दौरान सौरभ शुक्ला ने सौ से अधिक फिल्मों में काम किया है। इस दौरान उन्होंने बतौर लेखक भी काम किया और उनकी एक्टिंग की ही तरह सौरभ शुक्ला की लेखनी को भी सराहा गया। फिल्म 'सत्या' की भी कहानी उन्होंने ही लिखी। सौरभ शुक्ला की अगली मंजिल निर्देशक बनने की है। हम उम्मीद करेंगे कि सौरभ शुक्ला की ये चाह जल्द ही पूरी हो और हमें उनकी शख्सियत का एक और पहलू देखने को मिले।
अगली कहानी किसी और सीक्रेट सुपरस्टार की होगी। फिल्मों के इन लाइफ सपोर्ट सिस्टम टूल्स के बारे में पढ़ने के लिए आप पढ़ते रहिए बॉलीवुड लाइफ हिंदी।