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सिनेमा में 'फ्लाइंग सिख' और 'फ्लिकर सिंह' को लेजेंड बनाने में था पाकिस्तान का हाथ, जानिए ऐसा क्यों कह रहे हैं हम!

बॉलीवुड की इसी सिनेमैटिक फैंटेसी से तो हमारे आॅलरेडी लेजेंड प्लेयर लार्जर देन लाइफ बन जाते हैं।

By: BollywoodLife  |  Published: July 13, 2018 5:32 PM IST

सिनेमा में 'फ्लाइंग सिख' और 'फ्लिकर सिंह' को लेजेंड बनाने में था पाकिस्तान का हाथ, जानिए ऐसा क्यों कह रहे हैं हम!

वॉर का मैदान हो या फिर खेल का हमें पाकिस्तान को धूल चाटते हुए देखने में जो मजा आता है, उसका कोई जवाब नहीं? शायद भारतीय दर्शकों की यही बात इंडियन फिल्ममेकर्स भी बखूबी जानते हैं और पाकिस्तान पर जीत का यही लम्हा हमारी फिल्मों में भी सबसे खास हो जाता है। आपको याद होगा जब हमारे फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह ने 'भाग मिल्खा भाग' में पाकिस्तान के धावक अब्दुल खालिक को धूल चटाई थी तो सिनेमाहॉल तालियों की गडगड़ाहट से गूंजने लगा था। [Soorma Movie Review : हॉकी के असली 'सूरमा' की कहानी को पर्दे पर दिल से जी गए दिलजीत दोसांझ]

दौड़ते हुए घायल मिल्खा सिंह की खून से सनी हुई पट्टियां हवा में लहरा रही थी और मानों मिल्खा का हर कदम मैदान पर नहीं बल्कि पाकिस्तान की छाती पर ही पड़ रहा हो... अब्दुल खालिक ने जान लगा दी, लेकिन उसके मुकाबले हमारे घायल मिल्खा का अदम्य साहस ही काम आया। बॉलीवुड की इसी सिनेमैटिक फैंटेसी से तो हमारे आॅलरेडी लेजेंड प्लेयर लार्जर देन लाइफ बन जाते हैं। हम ऐसा इसलिए भी कह रहे हैं, क्योंकि कुछ ऐसा ही दिलजीत दोसांझ और तापसी पन्नू की फिल्म 'सूरमा' में भी देखने को मिला है।

'भाग मिल्खा भाग' में मिल्खा सिंह ने भले ही तमाम देशों के धावकों को पछाड़ा हो लेकिन मजा आता है पाकिस्तान को हारते हुए देखने में...और अब इसी फॉर्मूले को शाद अली ने भी 'सूरमा' में यूज किया है। संदीप सिंह ने न जाने कितने मैच अपने जीवन में खेलें होंगे। खेल के क्षेत्र का सबसे बड़ा पुरस्कार अर्जुन अवॉर्ड हासिल किया, लेकिन बायोपिक बनी तो असली मजा पाकिस्तान को पछ़ाड़ने वाले सीन में ही दिखा। ये मजा इसलिए भी ज्यादा था, क्योंकि फिल्म में पाकिस्तान की ही टीम को तवज्जो भी दी गई और उसे ऐसे भी दिखाया गया कि बस पाकिस्तान को फतह कर लिया तो 'लेजेंड' बनना तय है।

फिर क्या था सामने हीरोइन है, कोच की बेशुमार उम्मीदे हैं, भारत की नजरें हैं और उससे भी बढ़कर सामने पाकिस्तान की टीम है। ये सीन फिल्म में 2012 ओलंपिक क्वालीफायर्स टूर्नामेंट से लिया गया है। 2012 में भारत ने ओलंपिक में क्वालीफाई तो कर लिया था, लेकिन फाइनल तक नहीं पहुंच सका था। बायोपिक बननी थी और उसमें रोमांच की भी पूरी गुंजाइश रखनी थी, लिहाजा एक मैच जो कि पाकिस्तान के साथ था उसी पर फोकस किया गया और रच दिया गया एक शानदार प्लेयर को 'लेजेंड' बनाने का सिनेमाई इतिहास। फर्ज कीजिए फिल्म में आखिरी मैच पाकिस्तान के बजाय पोलैंड के साथ भी दिखाया गया होता तो क्या संदीप सिंह के बेहतर प्लेयर होने को नकारा जा सकता था! शायद नहीं...लेकिन तब शायद भावनाएं उस कदर हिलोरे नहीं मारती। दिलचस्प बात यह है कि 'सूरमा' में ड्रैग फ्लिकर संदीप सिंह के सामने पाकिस्तान के सबसे मंझे हुए खिलाड़ी के तौर पर रियल लाइफ में संदीप के भाई बिक्रमजीत सिंह ही नजर आए हैं।

ये बेहद मायूस करना वाला भी था, क्योंकि फिल्म यहीं खत्म हो जाती है...इससे आगे के संदीप सिंह को आप नहीं जान पाते। खासकर उस संदीप को जो टीम के हारने के बाद एयरपोर्ट से घर लौट रहा है या फिर हार के बाद के हालात पर। आप ये भी नहीं जान पाते कि बतौर कैप्टन संदीप सिंह की रणनीति कैसी होती थी या फिर ड्रेसिंग रूम में मैच से पहले संदीप सिंह क्या सोच रहे होते थे...फिल्म कहने को तो बायोपिक है, लेकिन कम से कम इसमें हमारे प्लेयर को लेजेंड बनाती है पाकिस्तान की टीम।

फिल्म बॉक्स आॅफिस पर क्या करिश्मा करती है, यह तो जल्द पता चल जाएगा, लेकिन इस सीन ने एक बार यही साबित किया है कि रोमांच और फीलिंग को पर्दे पर लाने के लिए पाकिस्तान के बिना तो बॉलीवुड का काम नहीं ही चलने वाला है। ये वैसा ही है जैसे रशियन फिल्मों में अमरीकी विलेन या फिर अमरीकी फिल्मों में रशियन!