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मिर्जया फिल्म रिव्यू: साहिबान ने मिर्जा के तीर क्यों तोड़े, इसका जवाब जानने में नाकाम रहे गुलज़ार और राकेश ओम प्रकाश मेहरा

बेमिसाल विजुअल्स और बेहतरीन म्यूजिक के बाबजूद फिल्म 'मिर्जया' मास्टर पीस नहीं बन पाती हैं, केवल एक औसत फिल्म बनकर रह जाती है

By: Rahul Sharma  |  Published: October 7, 2016 7:18 PM IST

मिर्जया फिल्म रिव्यू: साहिबान ने मिर्जा के तीर क्यों तोड़े, इसका जवाब जानने में नाकाम रहे गुलज़ार और राकेश ओम प्रकाश मेहरा

हम सभी ने बचपन से कई प्रेम कहानियां सुनी हैं, उन्हीं कई प्रेम कहानियों में से एक है मिर्जा-साहिबान की प्रेम कहानी। बॉलीवुड में हमेशा से हीर-रांझा, लैला मजनू की कहानियों पर फिल्में बनती रही हैं लेकिन किसी भी डायरेक्टर ने मिर्जा-साहिबान की प्रेम कहानी को एक्सप्लोर करने की नहीं हिम्मत नहीं की। अंत में ये बीड़ा उठाया है बॉलीवुड डायरेक्टर राकेश ओम प्रकाश मेहरा और गुलज़ार साहब ने। गुलज़ार साहब ने फिल्म ‘मिर्जया’ के ट्रेलर लांच के दौरान बताया था कि फिल्म को बनाने की कवायद उस समय शुरु हुई जब फिल्म के डायरेक्टर राकेश ओम प्रकाश मेहरा ने एक दिन उनसे ये पूछ लिया कि साहिबान ने मिर्जा के तीर क्यों तोड़ दिए थे। उसी समय से गुलज़ार साहब ने इस सवाल का जवाब ढूंढना शुरु किया और फिल्म मिर्जया के रुप में लोगों के सामने इस जवाब को पेश किया है। तो आइये जानते हैं राकेश ओम प्रकाश मेहरा और गुलज़ार साहब ने इस सदियों पुरानी प्रेम कहानी को किस प्रकार से लोगों के सामने पेश किया है।

फिल्म की कहानी-
फिल्म ‘मिर्जया’ की कहानी को राकेश और गुलज़ार साहब ने दो पैरेलल स्टोरीज़ के माध्यम से लोगों के सामने पेश करने की कोशिश की है। एक कहानी है मिर्जा-साहिबान की और दूसरी कहानी है मोनीश (हर्षवर्धन) और सुचित्रा (सैयामी खेर) की। फिल्म में मिर्जा-साहिबान की कहानी को वैसे ही पेश किया गया है जैसा कि हमने बचपन से सुना है लेकिन मोनीश और सुचित्रा की कहानी को राजस्थान के परिवेश में गढ़ा गया है। जो दो ऐसे प्रेमियों की कहानी है, जिनको हालातों के कारण बचपन में बिछुड़ना पड़ जाता है। यह बचपन का प्यार दोनों लोगों को जवानी तक याद रहता है, जो कि अचानक दोनों के सामने तब आकर खड़ा हो जाता है जब सुचित्रा की शादी करन (अनुज चौधरी) से होने वाली है। अनुज चौधरी ने फिल्म में एक रजवाड़े खानदान के राजकुमार का रोल निभाया है और हर्षवर्धन ने करन के अस्तबल में काम करने वाले एक नौकर का किरदार निभाया है। जैसे-जैसे फिल्म की कहानी आगे बढ़ती जाती है, मोनीश और सुचित्रा पर इश्क का बुखार और तेजी से चढ़ता जाता है। तमाम हालातों से लड़ते हुए दोनों एक दूसरे को पाने की ज़िद कर बैठते हैं लेकिन अंत में क्या एक दूसरे को पा सके हैं या नहीं, ये आप थियेटर हॉल में जाकर देखें तो ज्यादा बेहतर रहेगा।

फिल्म का डायरेक्शन-
जब फिल्म मिर्जया का ट्रेलर रिलीज़ हुआ था तब लोगों को लगा था कि डायरेक्टर राकेश ओम प्रेकाश मेहरा बॉलीवुड को एक ऐसा मास्टर पीस देने वाले हैं जिसको लोग कई सालों तक याद रखेंगे लेकिन ऐसा हो नहीं पाया है। राकेश ‘मिर्जा-साहिबान’ और ‘मोनीश-सुचित्रा’ की कहानी के बीच फंस कर रह गये हैं। मोनीश-सुचित्रा की कहानी को फिल्म में और बेहतरीन तरह से दिखाया जा सकता था लेकिन जो सिचुएशन्स फिल्म में दिखाई गयी हैं वो भरोसेमंद नहीं लगती हैं। जैसे सालों तक विदेश में रहने के बाद भी सुचित्रा को मोनीश कैसे याद रह जाता है जबकि वो करन से प्यार करने लगी है और करन-सुचित्रा का प्यार इतना गहरा है कि वो लोग शादी करने का फैसला ले चुके हैं।

दूसरी तरफ अगर फिल्म में मिर्जा-साहिबान की कहानी की बात की जाए तो उसको केवल विजुअल्स के माध्यम से पेश किया गया है। जिसको राकेश ओम प्रकाश मेहरा ने इतनी खूबसूरती से शूट किया है कि एक-एक सीन पेंटिग लगता है। पर्दे पर इन विचुअल्स का बैकग्राउंड म्यूजिक आपका मन मोह लेता है लेकिन तभी कहानी वर्तमान में आ जाती है, जो ऑडियंस का ध्यान भंग कर देती है। थियेटर में लग रहा था कि लोग मिर्जा-साहिबान को ज्यादा देर तक पर्दे पर देखना चाहते थे लेकिन उनको मोनीश-सुचित्रा को जबरदस्ती दिखाया जा रहा है। अंत में राकेश ओम प्रकाश मेहरा के डायरेक्शन के बारे में यही बोला जा सकता है कि यह उनकी तरफ से बेहतरीन काम है लेकिन ये पर्दे पर उभर कर नहीं आ पाता है।

फिल्म का स्क्रीनप्ले-
फिल्म लिखने का काम गुलज़ार साहब ने किया है। गुलज़ार साहब ने मिर्जा-साहिबान की कहानी को अपनी तरह से पेश करने की कोशिश की है, जो दो कहानियों को एक साथ लिये चलती है। शायद यही फिल्म की सबसे बड़ी कमज़ोरी बन जाती है। अगर फिल्म का माध्यम से मिर्जा-साहिबान की कहानी को बताना ही था तो किसी एक कहानी के माध्यम से भी यह काम किया जा सकता था।

फिल्म का म्यूजिक-
शंकर-अहसान-लॉय का म्यूजिक ही ‘मिर्जया’ का अकेला ऐसा हिस्सा है जो लोगों को थियेटर में कुछ इंजॉय करने का मौका देता है। जहां-जहां भी फिल्म के गाने आते हैं फिल्म का स्तर बढ़ जाता है। शंकर-अहसान-लॉय ने अपनी तरफ से फिल्म में बेहतरीन म्यूजिक दिया है लेकिन इसके लिए सिर्फ इनकी तारीफ करना ठीक नहीं है। इसमें गुलज़ार साहब के शब्दों का भी बहुत बड़ा हाथ हैं, जो लोगों को झूमने पर मजबूर कर देते हैं। फिल्म की हर एक सिचुएशन के मुजाबित गाने बनाये गये हैं, जो फिल्म को आगे बढ़ने में बहुत मदद करते हैं। अगर ऐसा बोला जाए कि फिल्म के गाने, डायलॉग्स से ज्यादा बोलते हैं तो गलत नही होता।

फिल्म की सिनेमेटॉग्राफी
फिल्म में सिनेमेटॉग्राफी पावेल डायल्लस ने की है। इस फिल्म के लिए पावेल की जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है। पावेल ने फिल्म के सीन्स को इस तरह से शूट किया है कि जो पर्दे पर दिख रहा सीन आपको जीवंत लगने लगता है। फिल्म का मिर्जा-साहिबान वाला पार्ट पावेल ने इस तरह से डिजाइन किया है कि वो आपको लगता ही नहीं है कि आप कोई बॉलीवुड फिल्म देख रहे है।

कलाकारों की एक्टिंग –
जैसा कि हम सब जानते हैं कि फिल्म मिर्जया से हर्षवर्धन कपूर और सैयामी खेर बॉलीवुड में एंट्री ले रहे हैं। जिनको मिर्जया मे काम करने का मौका मिलना बहुत बड़ी बात थी। यह फिल्म उनके करियर में बहुत बड़ा रोल प्ले करने वाली है। सैयामी और हर्षवर्धन मिर्जा-साहिबान के रोल में खूब जमें हैं। जहां सिर्फ दोनों कलाकारों को अपने चेहरे से लोगों को बांधना था, इनके एक्सप्रेशन वो काम करने में कामयाब हुए हैं। लेकिन अगर बात मोनीश और सुचित्रा की करें तो दोनों कलाकार स्क्रीन पर उतने दमदार नहीं दिखाई पड़ते हैं। कहीं-कहीं पर तो हर्षवर्धन और सैयामी की अदाकारी ओवर लगती है।

फिल्म में इन हर्षवर्धन और सैयामी के अलावा दो और महत्वपूर्ण किरदार है, एक हैं करन यानि कि अनुज चौधरी का जो एक राजकुमार का रोल अदा कर रहे हैं। अनुज अपने रोल को बखूबी निभाते नज़र आते हैं। फिल्म में जितना भी समय वो पर्दे पर आते हैं अपनी परफॉर्मेंस से लोगों को बांधे रखते हैं। अगर उनके रोल को कुछ और ज्यादा समय दिया जाता तो वो फिल्म की हाइलाइट बन सकते थे।

दूसरा किरदार है अर्त मलिक का जो कि एक सैयामी खेर के पिता और पुलिस कमिश्नर का किरदार नीभाते नज़र आते हैं। अर्त मलिक अपने किरदार के साथ एक दम न्याय नहीं कर पाये हैं। वो एक राजस्थानी किरदार निभा रहे हैं जो कि पश्तूनी बोल रहा है। फिल्म के बीच-बीच में उनका पश्तूनी एक्सेंट अखरता है। फिल्म में अंजली पाटिल, ओमपुरी और के.के. रैना छोटे-छेटो किरदारों में नज़र आये हैं। जो अपना काम बखूबी निभा रहे हैं। अंजली अपने छोटे से किरदार में लोगों को याद रह जाती हैं और ओमपुरी के पास फिल्म में यादगार बनाने जैसा कुछ है।

फाइनल वर्डिक्ट-
जैसा कि मैंने पहले भी कहा कि फिल्म की शुरुआत ये जवाब ढूंढने के लिए की गयी है कि साहिबान ने मिर्जा के तीर क्यों तोड़ डाले थे? ऐसा क्या साहिबा के दिमाग में चल रहा था? फिल्म वो जवाब ढूंढने में नाकाम रहती है। हो सकता है कि ये जवाब गुलज़ार साहब और राकेश को मिला हो लेकिन वो दर्शकों तक उसे पहुंचाने में नाकाम रहे हैं। बेमिसाल विजुअल्स और बेहतरीन म्यूजिक के बाबजूद भी फिल्म मास्टर पीस नहीं बन पाती हैं। हर्षवर्धन कपूर और सैयामी खेर द्वारा अभिनित ये फिल्म अंत तक मात्र एक औसत फिल्म बनकर रह जाती है। मैं इस फिल्म को 5 में से केवल 2 स्टार देना चाहूंगा।