तुलसी बनीं कैदियों की मसीहा
‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी' के एपिसोड की शुरुआत जेल के अंदर फैले भारी तनाव से होती है. लेडी डॉन अरुंधति जानबूझकर साफ किए हुए बर्तनों को गंदा कर देती है ताकि वो तुलसी को भड़का सके. वो गुस्से में तुलसी को 'डायन' बुलाती है और ताना मारती है कि उसने अपने ही बेटे और पोते की जान ले ली. अरुंधति, तुलसी को अपनी गैंग में शामिल होने का ऑफर देती है, लेकिन तुलसी बड़े ही शांत भाव से मना कर देती हैं. तुलसी कहती हैं कि वो यहां सिर्फ अपने कर्मों की सजा काटने आई हैं, किसी से दोस्ती या दुश्मनी करने नहीं.
इस कड़वाहट से टूटकर तुलसी ठाकुरजी की मूरत के सामने जाकर रोने लगती हैं. वो कहती हैं कि उन्होंने हमेशा भगवान की हर आज्ञा का पालन किया, लेकिन अब वो इस जिंदगी से थक चुकी हैं और मुक्ति चाहती हैं. तुलसी अपना दर्द बयां करते हुए कहती हैं कि जब उनके बेटों अंश और पार्थ ने अपनी पत्नियों को सरेआम जलील किया और यहां तक कि उनका गला दबाने की कोशिश की, तब भी उन्होंने कभी शिकायत नहीं की. लेकिन अब उनमें इस मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना को सहने की हिम्मत नहीं बची है.
तुलसी की बातें सुनकर ठाकुरजी प्रकट होते हैं और उन्हें याद दिलाते हैं कि उन्होंने पहले भी एक बार यही बात कही थी कि वो जीना नहीं चाहतीं. ठाकुरजी उन्हें समझाते हैं कि उन्हें अपने अस्तित्व का असली मतलब ढूंढना होगा. जब तुलसी वैष्णवी के दुखों और आंसुओं की शिकायत करती हैं, तो ठाकुरजी कहते हैं कि उनका खुद का जन्म भी तो जेल की कालकोठरी में हुआ था, जहां उनके अपने सगे मामा उनकी जान लेने पर तुले थे. भगवान कहते हैं कि जिंदगी देने वाला और लेने वाला वही है, और तुलसी को उनके जीवन का असली मकसद इसी जेल के अंदर समझ आएगा.
ठाकुरजी तुलसी को एक बहुत ही सुंदर बात समझाते हैं. वो कहते हैं, "तुलसी, तुम सिर्फ मेरी कहानी का एक मामूली किरदार नहीं हो. मैंने तुम्हारा नाम बहुत सोच-समझकर चुना था. तुलसी का पत्ता स्वाद में भले ही कड़वा हो, लेकिन उसमें शरीर से बड़े से बड़े जहर को बाहर निकालने की ताकत होती है. तुम्हारा काम समाज को देना है, लेना नहीं, और यही तुम्हारी जिंदगी को सार्थक बनाता है."
ठाकुरजी के इन वचनों से तुलसी के भीतर एक नई ऊर्जा आती है. तभी अचानक वो देखती हैं कि अरुंधति जेल के अंदर एक बेबस कैदी को जान से मारने की कोशिश कर रही है और दूसरों का खाना छीनकर उन पर जुल्म ढा रही है. ठाकुरजी की सीख को याद करते हुए तुलसी इस बार चुप नहीं बैठतीं. वो शेरनी की तरह आगे बढ़ती हैं और अरुंधति के सामने तनकर खड़ी हो जाती हैं.
तुलसी सबके सामने अरुंधति के अतीत का काला पन्ना खोल देती हैं. वो बताती हैं कि कैसे अरुंधति ने अपने बच्चे को बचाने के लिए अपने ही पति को मार डाला था और बाद में अपने बेटे की हत्या के आरोप में जेल आ गई. तुलसी कहती हैं कि इसी अकेलेपन और नफरत की वजह से आज अरुंधति दूसरों को तंग करती है. ऐसी ही एंटरटेनमेंट खबरों को जानने के लिए पढ़ते रहिए बॉलीवुडलाइफ हिंदी.